Core Of The Heart

भूल के काली शब को , लिखो एक नया कुर्शिदा | गुम न होने पाए आवाज तेरी , बरसों तक सुनाई देती रहे सदा ||

24 Posts

145 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10014 postid : 34

ईश्वर की व्यापकता और मेरी सोंच

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हम सब जानते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापक है । लेकिन फिर भी हम उसे खोजने की कोशिश करते हैं । तो चलिए देखते हैं वो किन लोगों को कहाँ मिलता है ।

ऐ मेरे ईश्वर,

जो कर्म में विश्वास करते हैं ,
अहर्निष कर्म में लीन रहते हैं ,
कर्म ही पूजा है जिनका ,
कर्म में सब कुछ ही सहते हैं ,
ऐसे कर्म योगियों का ,
तू कहीं कर्म फल तो नहीं ।

जो बेघर हैं,
खुले आकाश तले सोते हैं ,
ठिठुरते हैं सर्दियों में, बरसात में भीगते हैं ,
और गर्मियों में रोते हैं ,
ऐसे गृह विहीन लोगों के
तू सपनों का महल तो नहीं ।

जो वनवासी हैं ,
नित वन में विचरते हैं ,
सहते हैं अत्याचार मानवों के ,
अपने घर को उजड़ता हुआ देखते हैं ,
ऐसे बेजुबान प्राणियों का
तू हरा – भरा जंगल तो नहीं ।

जो अवसाद ग्रस्त हैं ,
सदा ही चिंतित रहते हैं ,
सुख को भोगने से उन्हें डर लगता है ,
सदा दुःख के प्रकोप सहते हैं ,
ऐसे बेचारे लोगों के परिजनों का ,
तू कहीं कुशल – मंगल तो नहीं ।

जो अकेले हैं ,
जिनका यहाँ कोई नहीं है
जो सदा अपनों की तलाश करते हैं ,
जिन्हें लगता है उनका कोई तो कहीं है
ऐसे एकाकी लोगों के
तू माँ का आँचल तो नहीं ।

क्रमशः

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

12 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
November 9, 2012

सुन्दर भाव और प्रस्तुति विवेक जी.

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    November 10, 2012

    बहुत-बहुत धन्यवाद, आदरणीया निशा जी ।

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
November 8, 2012

बहुत सुन्दर कविता विवेक जी . जो कर्म में विश्वास करते हैं , अहर्निष कर्म में लीन रहते हैं , कर्म ही पूजा है जिनका , कर्म में सब कुछ ही सहते हैं , ऐसे कर्म योगियों का , तू कहीं कर्म फल तो नहीं बहुत सुन्दर पंक्तियाँ .

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    November 8, 2012

    बहुत – बहुत धन्यवाद आपका, आदरणीय राजीव जी ।

phoolsingh के द्वारा
November 7, 2012

विक्रम जी प्रणाम जिनका यहाँ कोई नहीं है जो सदा अपनों की तलाश करते हैं , जिन्हें लगता है उनका कोई तो कहीं है ऐसे एकाकी लोगों के तू माँ का आँचल तो नहीं । बहुत ही सुंदर व्याख्यान……… फूल सिंह

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    November 7, 2012

    प्रणाम फूल सिंह जी , आभारी हूँ आपका ।

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 7, 2012

अद्भुत

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    November 7, 2012

    बहुत – बहुत धन्यवाद यतीन्द्र जी , स्नेह बनाये रखियेगा ।

akraktale के द्वारा
November 5, 2012

विवेक जी             सादर, सुन्दर रचना अगले भाग का इन्तजार रहेगा. बधाई स्वीकारें. 

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    November 7, 2012

    बहुत – बहुत धन्यवाद आदरणीय अशोक जी ।

Santlal Karun के द्वारा
November 4, 2012

संवेदना तथा अनुभूति से उपजे अत्यंत अर्थवान, प्रभावपूर्ण और पठनीय रचना के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “जो बेघर हैं, खुले आकाश तले सोते हैं , ठिठुरते हैं सर्दियों में, बरसात में भीगते हैं , और गर्मियों में रोते हैं , ऐसे गृह विहीन लोगों के तू सपनों का महल तो नहीं ।”

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    November 4, 2012

    आदरणीय संतलाल जी , आपका बहुत – बहुत धन्यवाद ।


topic of the week



latest from jagran