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भूल के काली शब को , लिखो एक नया कुर्शिदा | गुम न होने पाए आवाज तेरी , बरसों तक सुनाई देती रहे सदा ||

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क्या हम मिट्टी के खिलौने हैं ?

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क्या तू एक अल्पवय, अबोध बालक ,
और हम तुझे प्रदत्त क्षण – भंगुर मिट्टी के खिलौने हैं ?
तू है नटखट, चंचल प्रतिपल
और तेरे समक्ष हम बौने हैं ?

जब चाहे खेल लिया हमसे ,
जब चाहे फ़ेंक दिया |
अपना मन बहलाया हमसे ,
और हमें ही दर्द अनेक दिया |

तुने क्या सोंचा, हम तेरे हाथों में फंसे ,
तेरा विरोध क्या कर पायेंगे ?
मिट्टी से ही निर्मित, मिट्टी पर ही जीवित ,
फिर मिट्टी में ही मिल जायेंगे ?

मिटटी से निर्मित हम ,
पर फौलाद का आत्मविश्वास है |
मनुष्य हैं हम भी , सिर्फ आप नहीं ,
हमारे शरीर में भी लाल रक्त और अस्थियों का वास है |

किसी की खैरात नहीं ,
हमारे पास भी ईश्वर-प्रदत्त जान है |
तो क्यूँ हम किसी की गुलामी करें ?
जब हमारे पास भी जिंदगी और अरमान हैं |

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
July 29, 2012

विवेक जी नमस्कार, विचारों को सुन्दरता से रचना में गढ़ने के लिए आभार. बधाई.

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    July 29, 2012

    नमस्कार अशोक जी, सराहना के लिए धन्यवाद |

pritish1 के द्वारा
July 29, 2012

आपकी रचना का जवाब नहीं………मित्रवर हमारे पास भी ईश्वर-प्रदत्त जान है | तो क्यूँ हम किसी की गुलामी करें ? जब हमारे पास भी जिंदगी और अरमान हैं | बहुत अच्छी पंक्तियाँ……… समय है जागरण का अवश्य पढें…… http://pritish1.jagranjunction.com/2012/07/28/sarfaroshi-ki-tamanna-ab-hamare-dil-main-hai/

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    July 29, 2012

    बहुत – बहुत धन्यवाद एवं आभार |

dineshaastik के द्वारा
July 28, 2012

मिट्टी से ही निर्मित, मिट्टी पर ही जीवित , फिर मिट्टी में ही मिल जायेंगे ? मिटटी से निर्मित हम , पर फौलाद का आत्मविश्वास है | मनुष्य हैं हम भी , सिर्फ आप नहीं , हमारे शरीर में भी लाल रक्त और अस्थियों का वास है | किसी की खैरात नहीं , हमारे पास भी ईश्वर-प्रदत्त जान है | तो क्यूँ हम किसी की गुलामी करें ? जब हमारे पास भी जिंदगी और अरमान हैं | आदरणीय विवेक जी बहुत ही सुन्दर एवं सराहनीय पंक्तियाँ…

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    July 28, 2012

    बहुत - बहुत धन्यवाद दिनेश जी |

Chandan rai के द्वारा
July 27, 2012

विवेक जी , क्या तू एक अल्पवय, अबोध बालक , और हम तुझे प्रदत्त क्षण – भंगुर मिट्टी के खिलौने हैं ? तू है नटखट, चंचल प्रतिपल और तेरे समक्ष हम बौने हैं ? जब चाहे खेल लिया हमसे , जब चाहे फ़ेंक दिया | बेहतरीन रचना !

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    July 27, 2012

    बहुत – बहुत धन्यवाद चन्दन जी |


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