Core Of The Heart

भूल के काली शब को , लिखो एक नया कुर्शिदा | गुम न होने पाए आवाज तेरी , बरसों तक सुनाई देती रहे सदा ||

24 Posts

145 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 10014 postid : 30

बलि - प्रथा

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हर प्रकार के जीवधारियों से ,
ये धरा उन्नत है |
पर “जीव के बदले जीव “,
ये कैसी मन्नत है ?

क्यूँ धर्म की आड़ में ,
लेते हो किसी के प्राण ?
क्या अब तक तुम ,
मृत्यु के भय से हो अनजान ?

किसी निरीह का रक्त बहाकर ,
खुद को भगवन के ऋण से मुक्त करते हो |
ईश्वर तो सर्वदाता हैं,
उनको बलि देकर भक्त बनने का स्वांग धरते हो |

क्या किसी माँ – बाप को ,
अपने ही संतान का खून पसंद है ?
तो तुने सोंच कैसे लिया जगत्पिता प्रसन्न होंगे ,
क्या तेरी बुद्धि इतनी मंद है ?

झूठे हैं वो लोग ,
कही है बलिदान की कथा |
किसी निर्दोष को मारना गुनाह है ,
अमानवीय है यह बलि – प्रथा |

भगवान को चाहिए ,
अमानवीय गुणों की क़ुरबानी |
नाकि मानव का धन ,
अनाज , खून और पानी ||

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 3.67 out of 5)
Loading ... Loading ...

14 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
July 25, 2012

वेदों में भी बलि -प्रथा की चर्चा है पर वहां बलि का अर्थ है ..भोजन | न ki किसी जीवंत जंतुओं का बध ! .बलि प्रथा की जीतनी भी ninda की जाए , कम होगी ! विवेक जी, अच्छी रचना-प्रस्तुति के लिए बधाई !

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    July 27, 2012

    नमस्कार आचार्य जी , बहुत – बहुत धन्यवाद |

seemakanwal के द्वारा
June 21, 2012

भगवान को चाहिए अमानवीय गुणों की क़ुरबानी ,विवेक जी हमारे अंधविश्वासों से पर्दा उठाती सुन्दर रचना है .

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    June 22, 2012

    बहुत – बहुत धन्यवाद एवं आभार आपका |

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
June 19, 2012

विवेक जी,नमस्कार. बलि प्रथा के सम्बन्ध में आपने उपयुक्त सवाल उठाए हैं .

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    June 22, 2012

    बहुत – बहुत धन्यवाद आपका |

चन्दन राय के द्वारा
June 18, 2012

विवेक जी , हर प्रकार के जीवधारियों से , ये धरा उन्नत है | पर “जीव के बदले जीव “, ये कैसी मन्नत है ? क्यूँ धर्म की आड़ में , लेते हो किसी के प्राण ? क्या अब तक तुम , मृत्यु के भय से हो अनजान ? बेहतरीन रचना ! जो कहूंगा कम होगा !

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    June 22, 2012

    नमस्ते चन्दन जी , धन्यवाद |

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
June 12, 2012

आदरणीय विवेक जी , सादर मैं आपसे पूरी तरह से समत हूँ. भाव पूर्ण रचना के लिए बधाई

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    June 13, 2012

    धन्यवाद प्रदीप जी |

yamunapathak के द्वारा
June 9, 2012

विवेकजी,आपने इस ब्लॉग में जो भावाभिव्यक्ति की है उसे मैंने अभी ज़ल्द ही कामाख्या देवी के मंदिर में महसूस किया सोच ही रही थी इसे कलाम्बध्ह करूंगी पर आपके द्वारा लिखी यह कविता ne sab kuchh कह दिया. धन्यवाद

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    June 9, 2012

    नमस्ते यमुना जी | बहुत – बहुत धन्यवाद आपका | पर मैं चाहता हूँ कि आप भी इस बारे में लिखें |

jlsingh के द्वारा
June 9, 2012

भगवान को चाहिए , अमानवीय गुणों की क़ुरबानी | नाकि मानव का धन , अनाज , खून और पानी || बिलकुल सही!

    VIVEK KUMAR SINGH के द्वारा
    June 9, 2012

    नमस्ते जवाहर जी , बहुत धन्यवाद एवं आभार |


topic of the week



latest from jagran